Thursday, April 25, 2013

कमबख्त मोहब्बत हो गई ...

इक अजनबी से गुफ़्तगू नज़रों  की इनायत हो गई ...
दोस्ती का था इरादा कमबख्त मोहब्बत हो गई ...

बातों  ही बातों में ये क्या शरारत हो गयी ......
उन्होंने चूमा लबों  से और क़यामत हो गयी ....

नज़रों  से हुई नज़रें चार और चाहत हो गई .....
हमारी ज़िन्दगी अब तो उन्ही की अमानत हो गई ....

पिघलने लगे उनकी साँसों की गर्मी में इस तरह से ....
उनके आगोश में सिमटे तो इश्क़  की नीयत हो गई ....

हमारी ख़ामोशी ने बयाँ किया हाल-ए-दिल हमारा ....
ज़माने को तो हमारी ख़ामोशी से शिकायत हो गई .....

उनका दीदार किया तो आज खुदा की इबादत हो गई .....
उनका हर लफ्ज़ हमारे लिए कुरान  की आयत हो गई ......

लैला-मजनू, हीर-राँझा की तरह इश्क़ की नयी इबारत हो गई .....
अब तो हमें हर लम्हे में उनकी जरुरत हो गई .....

दुआ में माँगा करते थे रोज़ उन्हें हम .....
सामने पाकर उन्हें मेरे सपनों  की दुनिया हकीकत हो गई ....

मेरी रूह, मेरे रोम-रोम पर उनकी मिलकियत हो गई .....
यहाँ सब कहते है की दीवानों की सी मेरी हालत हो गयी .....

तूफ़ान में बुझ रही थी दिये  की "वर्तिका"
मिला साथ उनका तो ज़िन्दगी बेशकीमत हो गई ......

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