Wednesday, August 10, 2011

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन..........

बारिश में जो भीगी तो मुझको बचपन की यादें आ गई....
मिटटी की सौंधी सी खुशबू मन का कोना-कोना महका गई॥

देखा आज कुछ बच्चों को कागज़ की नाव बनाते हुए....
नाम लिखकर अपना मैं भी उसे कुछ दूर बहाकर आ गई॥

बड़े दिनों बाद आसमान में आज इन्द्रधनुष निकला हैं....
जाकर छत पर उसको छूने की कोशिश करके आ गई॥

फूलों वाला छाता लेकर इठलाती हुई स्कूल जाती थी....
उसी छाते को ओढ़कर मैं नुक्कड़ तक जाकर आ गई॥

याद आ गया दोस्तों के संग गीली मिट्टी में घरौंदे बनाना....
पीपल की छाँव तले एक घर अपना भी बनाकर आ गई॥

जमा हो गया है सड़क पर आज फिर से ढेर सा पानी....
उस पानी में उछल उछल सब कपड़े भिगो कर आ गई॥

खेलते हुए कीचड़ में सन गए सब हाथ पैर मेरे....
देखकर उनको दादी की फटकार मुझे याद आ गई॥

ठंडी-ठंडी हवा से तन में सिहरन सी उठने लगी....
चाय की चुस्की और गरम पकौड़े की तलब मन में जगा गई॥

उमड़-घुमड़ कर गरजे बादल और चमकी है ज़ोरों से बिजलियाँ....
डरकर छुपने को माँ का आँचल ढूंढने को आ गई॥

आसमान की बारिश वो अब आँखों से बरसने लगी है...
लगता हैं वो सारी यादें आंसुओं में सिमटकर आ गई॥


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