Wednesday, June 11, 2014

तारिफ़ करूँ क्या उसकी...

मेरा यार दुनिया से जुदा सा है ...
हर अंदाज़ उसका अलहदा सा है...

रातों में चमके है जुगनू सा चमचम..
वो शबनम से भीगी सुबह सा है...

बसे है जो खुशबू फिज़ाओ में ऐसी...
वो बारिश की सौंधी हवा सा है...

है फूलों सी शोखी चेहरे पे उसके..
आँखों में मदमस्त इक नशा सा है...

गुलशन है उसकी हँसी से ये आलम...
इक परिंदा जो आँगन में चहका सा है...

बातों में उसके है झरनों सा गुंजन...
वो बच्चों की सी मासूम अदा सा है...

है निर्मल वो जैसे हो बादल में चन्दा..
वो सजदे में मिलती दुआ सा है...

सपनों में आकर यूँ नींदे चुराना...
फ़साना अभी ये कुछ ताज़ा सा है...

ये दिल भी यूँ धडके है जोरों से ऐसे..
मेरा मन भी उन पर फ़िदा सा है...

गुनगुनाने लगे है जो सरगम पे उनकी..
लगे कोई नगमा सुहाना सा है...

यूँ नज़रे उठाना यूँ नज़रे झुकाना..
ये नज़रों की चोरी इक सज़ा सा है...

हैं बदले से अंदाज़ मेरे भी ऐसे...
ना मालूम मुझे आज हुआ क्या है...

डर लगता है कोई यूँ पूछ ना बैठे..
कि मेरी मुस्कराहट की वज़ह क्या है....

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