हवाओ में जाने क्यों एक खुशबू सी छाए है...
बहारे भी आज कुछ ज्यादा ही सकुचाये है...
झुकी हुई पलकों से हुए दीदार का क्या कहना..
कि नज़रे उठती ही नही परेशां से हम सिर झुकाए है...
जाने क्या ढूंढ रही थी उनकी वो एकटक निगाहें...
क्या पता था उन्हें कि हम मन ही मन घबराये है...
अब तो आलम कुछ ऐसा था दोस्तों..
कि बिना पिए हमने सारे होश गँवाए है..
दुआ मांगते है ठहर जाये ये पल यूँ ही..
बड़े दिनों बाद हम इतना शर्माए है...
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