Wednesday, June 11, 2014

इज़हार-ए-इश्क

जब से मिली है मेरी नज़र से उनकी नज़र...
ना शामो का ठिकाना है ना रातो की है खबर..
जब भी खोलते है लब आ जाता है उनका ज़िकर..
ना खुद का होश है ना ज़माने की है फ़िकर..
मुझ पर है उनकी चाहत का कुछ ऐसा ये असर...
उनके साथ से मेरी शब है उनके साथ ही सेहर...
चाहते है दिल की गहराइयों से उनको मगर...
खो ना दे पाकर उनको इसी बात का है डर...
उनसे हो मंजिल मेरी उनसे ही हो सफ़र...
हर जनम में मिले मुझे बस वो ही हमसफ़र...
दुआ है खुदा से ना दिखाए कभी जुदाई का मंजर...
हो जाये अटूट ये रिश्ता कर दे कुछ ऐसी मेहर...

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